मेड्रिड: इस साल अगस्त में दुनिया एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना की गवाह बनेगी। 12 अगस्त को होने वाला पूर्ण सूर्य ग्रहण आर्कटिक के ऊपर से शुरू होगा और पूर्वी ग्रीनलैंड, पश्चिमी आइसलैंड तथा स्पेन के बड़े हिस्सों से होकर गुजरेगा। पूर्ण सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है और कुछ समय के लिए सूर्य की पूरी चमक को ढक देता है। पूर्णता के दौरान आसमान अचानक काफी अंधेरा हो जाता है और सूर्य के चारों ओर उसकी बाहरी परत कोरोना दिखाई देने लगती है।
1999 के बाद यह यूरोप के बड़े हिस्से में दिखाई देने वाला पहला पूर्ण सूर्य ग्रहण होगा। इस वजह से खगोल विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों के लिए 12 अगस्त का दिन खास है। इस ग्रहण को समझने से पहले इतिहास के उन सूर्य ग्रहणों पर नजर डालना भी दिलचस्प है, जिन्होंने वैज्ञानिकों को सूर्य और ब्रह्मांड के बारे में नई जानकारी दी।
Solar Eclipse: इतिहास के 10 सबसे अहम सूर्य ग्रहण
1. 22 अक्टूबर, 2137 ईसा पूर्व का ग्रहण
सूर्य ग्रहण से जुड़ी सबसे पुरानी और मशहूर कहानियों में से एक प्राचीन चीन से आती है। कहानी ही और हो नाम के दो चीनी शाही खगोलशास्त्रियों की है। कहा जाता है कि वे शराब के नशे में थे और सूर्य ग्रहण की भविष्यवाणी करने में नाकाम रहे। इसके बाद उन्हें मौत की सजा दी गई।
22 अक्टूबर, 2137 ईसा पूर्व का ग्रहण इसी कहानी की वजह से इतिहास में खास जगह रखता है। हालांकि इस घटना से जुड़ी कहानी में ऐतिहासिक और पौराणिक तत्वों को अलग करना आसान नहीं है, फिर भी यह दिखाती है कि प्राचीन समाजों में सूर्य ग्रहण को कितना महत्वपूर्ण माना जाता था।
2. 19 जुलाई, 418 का सूर्य ग्रहण
19 जुलाई 418 का पूर्ण सूर्य ग्रहण खगोल विज्ञान के इतिहास में एक अलग वजह से महत्वपूर्ण है। यूनानी चर्च इतिहासकार फिलोस्टोर्जियस ने ग्रहण के पूर्ण चरण के दौरान आसमान में तारों और एक धूमकेतु का उल्लेख किया था। उस समय ग्रहण के दौरान किसी धूमकेतु का इस तरह दर्ज होना एक असाधारण खगोलीय अवलोकन माना गया।
आज हमें पता है कि पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान सूर्य की तेज रोशनी अचानक कम हो जाने पर आमतौर पर दिखाई न देने वाली खगोलीय चीजों को देखना आसान हो सकता है।
3. 17 जुलाई, 334 का ग्रहण और सूर्य की लपटें
लैटिन लेखक और ज्योतिषी जूलियस फर्मिकस मैटरनस ने 334 के एक ग्रहण के दौरान सूर्य के किनारे से दिखाई देने वाली चमकीली संरचनाओं का वर्णन किया था। इन्हें आज हम सूर्य की prominences यानी सूर्य की सतह से ऊपर उठी गर्म गैस की बड़ी संरचनाओं के रूप में जानते हैं।
इस घटना को इसलिए दिलचस्प माना जाता है क्योंकि यह पूर्ण सूर्य ग्रहण नहीं, बल्कि वलयाकार ग्रहण था। उस समय सूर्य के किनारे दिखाई देने वाली ऐसी संरचनाओं को समझना आसान नहीं था।
4. 28 जुलाई, 1851 का पहला सफल ग्रहण फोटो
1851 का सूर्य ग्रहण खगोल विज्ञान और फोटोग्राफी, दोनों के इतिहास में खास है। रूसी फोटोग्राफर बर्कोव्स्की ने इस ग्रहण के दौरान पूर्ण सूर्य ग्रहण की पहली सफल तस्वीर खींची। इसके लिए उन्होंने प्रशिया की रॉयल ऑब्जर्वेटरी में मौजूद उपकरणों में से एक पर 2.4 इंच का रिफ्रैक्टर लगाया और करीब 84 सेकंड तक डैग्युरियोटाइप प्लेट को एक्सपोज किया।यह तस्वीर इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि पहली बार ग्रहण के दौरान सूर्य के कोरोना को सिर्फ आंखों से देखने के बजाय कैमरे में स्थायी रूप से दर्ज किया गया।
5. 20 मार्च, 71 का शानदार नजारा
ग्रीक दार्शनिक प्लूटार्क ने सूर्य ग्रहण के दौरान दिखाई देने वाली कोरोना का उल्लेख किया था। उनके वर्णन के मुताबिक, जब चंद्रमा सूर्य को पूरी तरह ढक लेता है, तब सूर्य के आसपास एक अलग तरह की रोशनी दिखाई देती है। आज हम जानते हैं कि यह रोशनी सूर्य का कोरोना है—सूर्य का बेहद गर्म और बहुत पतला बाहरी वातावरण। पूर्ण ग्रहण के दौरान सूर्य की चमकदार सतह चंद्रमा के पीछे छिप जाती है और तभी कोरोना साफ दिखाई देने लगता है।
6. 22 मई, 1724 में कोरोना की पहचान
प्लूटार्क ने सदियों पहले सूर्य के आसपास दिखाई देने वाली इस रोशनी का वर्णन कर दिया था। लेकिन बाद में वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की कि आखिर यह रोशनी आती कहां से है। स्पेनिश खगोलशास्त्री जोस जोआकिन डी फेरर ने न्यूयॉर्क के किंडरहुक से 1724 का पूर्ण सूर्य ग्रहण देखा। उन्होंने कोरोना शब्द का इस्तेमाल किया और यह समझने की कोशिश की कि यह संरचना चंद्रमा की नहीं, बल्कि सूर्य की है। यह विचार महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे कोरोना को सूर्य के अपने वातावरण के रूप में समझने की दिशा में रास्ता खुला।
7. 18 अगस्त, 1868 और हीलियम की खोज
1868 का सूर्य ग्रहण सूर्य के अलावा एक ऐसे तत्व की कहानी से जुड़ा है, जो बाद में पृथ्वी पर भी मिला। फ्रांसीसी खगोलशास्त्री पियरे जूल्स सीजर जानसेन और ब्रिटिश खगोलशास्त्री नॉर्मन लॉकयर ने स्वतंत्र रूप से सूर्य के स्पेक्ट्रम में एक ऐसी रेखा देखी, जो किसी ज्ञात तत्व से मेल नहीं खाती थी।
लॉकयर ने अनुमान लगाया कि यह किसी ऐसे तत्व का संकेत है, जिसे उस समय तक पृथ्वी पर खोजा नहीं गया था। उन्होंने इसका नाम हीलियम रखा। यह नाम ग्रीक सूर्य देवता हेलिओस से लिया गया था। बाद में हीलियम पृथ्वी पर भी खोजा गया और इस तरह सूर्य की रोशनी का अध्ययन करके एक नए तत्व का पता लगाने का यह उदाहरण विज्ञान के इतिहास में बेहद खास बन गया।
8. 15 मई, 1836—बेली के मोती
पूर्ण सूर्य ग्रहण के ठीक पहले और ठीक बाद सूर्य की रोशनी कभी-कभी मोतियों जैसी चमकीली बूंदों में दिखाई देती है। इन्हें बेली के मोती कहा जाता है। खगोलशास्त्री फ्रांसिस बेली ने 1836 में इस घटना की सही वजह समझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
असल में चंद्रमा पूरी तरह चिकना गोला नहीं है। उसकी सतह पर पहाड़, घाटियां और गड्ढे हैं। जब चंद्रमा सूर्य को ढकता है, तो सूर्य की रोशनी इन ऊबड़-खाबड़ हिस्सों के बीच से कुछ जगहों पर निकलकर हमारी आंखों तक पहुंचती है। इसी वजह से पूर्णता से ठीक पहले और बाद में हमें रोशनी के छोटे-छोटे चमकीले बिंदु दिखाई देते हैं।
9. 29 मई, 1919 का ग्रहण और आइंस्टीन
1919 का सूर्य ग्रहण सिर्फ खगोल विज्ञान के लिए नहीं, बल्कि आधुनिक भौतिकी के लिए भी ऐतिहासिक था। अल्बर्ट आइंस्टीन ने 1916 में सामान्य सापेक्षता का सिद्धांत प्रकाशित किया था। उनके सिद्धांत के मुताबिक गुरुत्वाकर्षण किसी भारी पिंड के आसपास अंतरिक्ष और समय को प्रभावित करता है। इसका एक नतीजा यह भी था कि किसी दूर के तारे की रोशनी सूर्य जैसे भारी पिंड के पास से गुजरते समय थोड़ा मुड़ सकती है।
29 मई 1919 के पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान वैज्ञानिकों ने सूर्य के पास दिखाई देने वाले तारों की तस्वीरें लीं। उनकी स्थिति की तुलना सामान्य समय में उनकी स्थिति से की गई। इन अवलोकनों ने आइंस्टीन के सिद्धांत के पक्ष में महत्वपूर्ण सबूत दिए। इस घटना ने सामान्य सापेक्षता को दुनिया भर में प्रसिद्ध कर दिया।
10. सबसे लंबा सूर्य ग्रहण
प्राकृतिक पूर्ण सूर्य ग्रहण की अवधि हमेशा एक जैसी नहीं होती। यह इस बात पर निर्भर करती है कि उस समय चंद्रमा, पृथ्वी और सूर्य की स्थिति कैसी है। अब तक के सबसे लंबे प्राकृतिक पूर्ण सूर्य ग्रहणों में से एक 15 जून 743 ईसा पूर्व का माना जाता है, जिसकी पूर्णता करीब 7 मिनट 28 सेकंड तक चली थी। लेकिन इंसानों ने पूर्ण ग्रहण को इससे कहीं ज्यादा समय तक भी देखा है।
30 जून 1973 को वैज्ञानिकों और यात्रियों ने कॉनकॉर्ड 001 सुपरसोनिक विमान से सूर्य ग्रहण का पीछा किया। विमान की तेज गति की वजह से वे पूर्णता के रास्ते में ज्यादा देर तक बने रह सके और करीब 74 मिनट तक पूर्ण ग्रहण का अनुभव किया। यह दिखाता है कि ग्रहण की अवधि सिर्फ आसमान में होने वाली घटना पर ही निर्भर नहीं करती। सही गति से चलने वाला विमान पृथ्वी की सतह पर किसी एक जगह से दिखाई देने वाली पूर्णता की अवधि को काफी बढ़ा सकता है।
अगस्त का पूर्ण सूर्य ग्रहण क्यों है खास?
12 अगस्त 2026 का पूर्ण सूर्य ग्रहण इसलिए खास है क्योंकि इसका पूर्णता वाला रास्ता आर्कटिक से लेकर ग्रीनलैंड, आइसलैंड और स्पेन के हिस्सों तक जाएगा। जहां पूर्ण ग्रहण दिखाई देगा, वहां चंद्रमा कुछ समय के लिए सूर्य की चमकदार सतह को पूरी तरह ढक देगा। उस दौरान दिन के उजाले में अचानक अंधेरा छा सकता है और सूर्य के चारों ओर कोरोना दिखाई दे सकता है।
सूर्य ग्रहण को समझने के लिए यही सबसे दिलचस्प बात है—चंद्रमा आकार में सूर्य से बहुत छोटा है, लेकिन पृथ्वी से उसकी दूरी ऐसी है कि आसमान में दोनों लगभग एक ही आकार के दिखाई देते हैं। इसी वजह से कभी-कभी चंद्रमा सूर्य को लगभग बिल्कुल सही तरीके से ढक लेता है।और जब ऐसा होता है, तो कुछ मिनटों के लिए हमें सूर्य का वह हिस्सा दिखाई देने लगता है जिसे सामान्य दिन में उसकी तेज रोशनी के कारण देख पाना संभव नहीं होता।इसीलिए सूर्य ग्रहण सिर्फ आसमान का एक खूबसूरत नजारा नहीं है। इतिहास में कई बार यही कुछ मिनट वैज्ञानिकों को ऐसी चीजें देखने का मौका देते रहे हैं, जिन्हें सामान्य परिस्थितियों में देखना बेहद मुश्किल होता।





