वॉशिंगटन: 27-28 अगस्त की दरम्यानी रात दुनिया के एक बड़े हिस्से में दुर्लभ आंशिक चंद्र ग्रहण दिखाई दिया। इस दौरान पृथ्वी की गहरी छाया यानी अम्ब्रा चंद्रमा की सतह के करीब 96 फीसदी हिस्से तक पहुंच गई।
चंद्रमा के इस बड़े हिस्से पर सीधे सूर्य की रोशनी नहीं पड़ रही थी। इसके बजाय पृथ्वी के वायुमंडल से होकर छनकर और मुड़कर आने वाली सूर्य की कुछ रोशनी चंद्रमा तक पहुंची। इसी वजह से छाया में गया चंद्रमा गहरे लाल रंग का दिखाई दिया।
ग्रहण के सबसे ज्यादा असर वाले समय में चंद्रमा का सिर्फ एक पतला हिस्सा सीधी धूप में बचा रहा। यह हिस्सा बाकी लाल चंद्रमा की तुलना में कई गुना ज्यादा चमकीला दिखाई देता है, जिससे चंद्रमा का किनारा कुछ कटा हुआ जैसा नजर आता है।
Lunar Eclipse: यह ग्रहण कैसे बना?
आंशिक चंद्र ग्रहण पूर्णिमा के दौरान होता है, जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है और चंद्रमा पृथ्वी की छाया से होकर गुजरता है।
इस दौरान पृथ्वी की गोल छाया धीरे-धीरे चंद्रमा की सतह पर आगे बढ़ती दिखाई देती है। इस ग्रहण में छाया का गहरा हिस्सा चंद्रमा के बहुत बड़े भाग पर पहुंच गया था।
ग्रहण के चरम पर एक पतली अर्धचंद्राकार पट्टी पर सूर्य की सीधी रोशनी पड़ती रही, जबकि बाकी लगभग पूरा चंद्रमा पृथ्वी की गहरी छाया में था।
यही वजह है कि इसे पूर्ण चंद्र ग्रहण नहीं कहा गया। पूर्ण ग्रहण में चंद्रमा का पूरा दिखाई देने वाला हिस्सा पृथ्वी की अम्ब्रा में चला जाता है।
चंद्र ग्रहण कहां दिखा?
27-28 अगस्त का यह आंशिक चंद्र ग्रहण उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में रहने वाले करीब 3.3 अरब लोगों को दिखाई दिया।
ग्रहण के अलग-अलग चरण दुनिया में देखने वालों के लिए एक ही खगोलीय घटना का हिस्सा थे, लेकिन स्थानीय समय हर जगह अलग था। इसकी वजह यह है कि पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों में चंद्रमा अलग समय पर आसमान में दिखाई देता है।
अमेरिका के वेस्ट कोस्ट पर लॉस एंजिल्स, कैलिफोर्निया और पोर्टलैंड, ओरेगन जैसे शहरों में ग्रहण का सबसे ज्यादा असर वाला समय सूर्यास्त के कुछ घंटे बाद आया।
वहीं न्यूयॉर्क और जैक्सनविले जैसे ईस्ट कोस्ट शहरों में रहने वाले लोगों के लिए ग्रहण का चरम आधी रात के आसपास दिखाई दिया।
भारत में नहीं दिखा ग्रहण
यूके, यूरोप और अफ्रीका के कई हिस्सों में यह ग्रहण सुबह के समय दिखाई दिया। इन जगहों पर ग्रहण के दौरान चंद्रमा पश्चिमी क्षितिज की ओर नीचे जा रहा था और कई इलाकों में यह सूर्योदय से ठीक पहले का समय था।
इसके उलट, जिस समय ग्रहण हो रहा था, पृथ्वी के दिन वाले हिस्से में मौजूद लोगों के लिए चंद्रमा आसमान में दिखाई नहीं दे रहा था।
इसी वजह से भारत, ऑस्ट्रेलिया, चीन और जापान जैसे कई देशों में यह ग्रहण नहीं देखा जा सका।
भारत में ग्रहण दिखाई न देने की मुख्य वजह यही थी कि ग्रहण के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में दिन था।
चंद्र ग्रहण देखने के लिए चश्मे की जरूरत नहीं
चंद्र ग्रहण को देखने के लिए सूर्य ग्रहण की तरह किसी खास सुरक्षा चश्मे की जरूरत नहीं होती।
चंद्रमा से आने वाली रोशनी इतनी तेज नहीं होती कि सामान्य परिस्थितियों में उसे नंगी आंखों से देखने से आंखों को नुकसान पहुंचे। इसलिए चंद्र ग्रहण को सीधे देखा जा सकता है।
हालांकि, दूरबीन या टेलीस्कोप से चंद्रमा की सतह, पृथ्वी की छाया और लाल रंग में बदलते हिस्से को और साफ देखा जा सकता है।
चंद्र ग्रहण कैसे होता है?
चंद्र ग्रहण तब होता है जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा लगभग एक सीध में आ जाते हैं और पृथ्वी सूर्य की रोशनी को चंद्रमा तक पहुंचने से रोकती है।
चंद्रमा जब पृथ्वी की छाया से होकर गुजरता है, तो उसका कुछ या पूरा हिस्सा अंधेरे में चला जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि चंद्रमा पूरी तरह गायब हो जाता है।
पृथ्वी का वायुमंडल सूर्य की रोशनी को मोड़ता है। लाल और नारंगी रंग की रोशनी वायुमंडल से होकर चंद्रमा तक पहुंच सकती है और उसकी सतह को हल्का लाल या गहरा तांबे जैसा रंग दे सकती है।
इसी वजह से पूर्ण चंद्र ग्रहण के दौरान दिखाई देने वाले लाल चंद्रमा को आम बोलचाल में ब्लड मून कहा जाता है।
27-28 अगस्त का ग्रहण पूर्ण चंद्र ग्रहण नहीं था, लेकिन चंद्रमा का करीब 96 फीसदी हिस्सा गहरी छाया में चले जाने की वजह से इसका दृश्य पूर्ण ग्रहण के काफी करीब दिखाई दिया।






