Only demo project: चीन का अंतरिक्ष कार्यक्रम जल्द ही चंद्रमा के अन्वेषण का एक बेहद चुनौतीपूर्ण अभियान शुरू करने की तैयारी में है। चांग’ई-7 मिशन का लक्ष्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के उन इलाकों का अध्ययन करना है, जहां हमेशा छाया रहती है और जहां जल-बर्फ के बारे में अब भी कई सवालों के जवाब नहीं मिले हैं। करीब दो दशक से वैज्ञानिक जानते हैं कि चंद्रमा पर किसी न किसी रूप में पानी मौजूद है। लेकिन यह अभी साफ नहीं है कि स्थायी रूप से छाया में रहने वाले क्रेटरों में कितनी जल-बर्फ है, वह सतह से कितनी गहराई पर मौजूद है और वहां उसका स्वरूप कैसा है। यही वजह है कि इन इलाकों को चंद्रमा के सबसे मूल्यवान हिस्सों में गिना जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि इन्हीं जगहों तक पहुंचना सबसे मुश्किल भी है।
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China Moon Mission: चांग’ई-7 इन अंधेरे क्रेटरों तक कैसे पहुंचेगा?
इन क्रेटरों की तलहटी में सूरज की रोशनी कभी नहीं पहुंचती। अरबों वर्षों से वहां मौजूद बर्फ बेहद कम तापमान में जमी हुई है, जो करीब माइनस 200 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। ऐसे इलाके में उतरना किसी सामान्य रोवर के लिए आसान नहीं है। क्रेटरों की दीवारें खड़ी हैं, जमीन ऊबड़-खाबड़ है और लगातार अंधेरा रहता है। चांग’ई-7 को इसी चुनौती को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। जनवरी 1959 में सोवियत संघ का लूना-1 यान चंद्रमा के आसपास पहुंचा था। उसके बाद से चंद्र अन्वेषण ने बहुत लंबा सफर तय किया है। अपोलो मिशनों और बाद के अभियानों ने हमें चंद्रमा के बारे में काफी जानकारी दी, लेकिन अब सवाल सिर्फ चांद तक पहुंचने का नहीं है। अगली चुनौती उन जगहों तक पहुंचने की है, जहां इंसानों के लिए जाना बेहद मुश्किल है और जहां पारंपरिक पहियों वाले रोवर भी आसानी से काम नहीं कर सकते।
इसी के साथ वैज्ञानिक यह भी समझना चाहते हैं कि क्या चंद्रमा भविष्य के अभियानों के लिए अपने ही कुछ संसाधन उपलब्ध करा सकता है।.चीन ने पिछले दो दशकों में इसी दिशा में लगातार अपने चंद्र अभियानों को आगे बढ़ाया है। इसके कार्यक्रम का नाम प्राचीन चीनी चंद्र देवी चांग’ई के नाम पर रखा गया है।.चांग’ई-7 को अगस्त 2026 के अंत तक चंद्रमा की ओर रवाना किए जाने की उम्मीद है। हालांकि चीन के एक अलग रॉकेट से जुड़ी हालिया विफलता के कारण प्रक्षेपण की तारीख को लेकर कुछ अनिश्चितता बनी हुई है।
चांग’ई-7 में क्या-क्या होगा?
चांग’ई-7 सिर्फ एक लैंडर वाला मिशन नहीं है। इसमें एक ऑर्बिटर, लैंडर, रोवर और एक खास तरह का हॉपर शामिल होगा। इसके अलावा च्वेछियाओ-2 चंद्र रिले उपग्रह पहले से ही अपनी जगह पर मौजूद है। इसे मार्च 2024 में अलग मिशन के तहत लॉन्च किया गया था। बाद में इसने चांग’ई-6 मिशन को भी सहयोग दिया था।
चांग’ई-7 के दौरान यही उपग्रह पृथ्वी और चंद्रमा की सतह के बीच संचार बनाए रखने में मदद करेगा। मिशन वास्तव में चंद्रमा की किस जगह उतरेगा, यह पूरी तरह तय नहीं है। हालांकि, इसके दक्षिणी ध्रुवीय-ऐटकेन बेसिन में शैकलटन क्रेटर के पास या उससे लगे किसी ऐसे ऊंचे इलाके में उतरने की संभावना है, जहां सूर्य की रोशनी पहुंचती है। इसके बाद मिशन का सबसे दिलचस्प हिस्सा काम में आएगा—हॉपर।
हॉपर क्यों है इस मिशन का सबसे दिलचस्प हिस्सा?
हॉपर को सामान्य रोवर से अलग तरीके से काम करने के लिए बनाया गया है। जहां रोवर अपने पहियों के सहारे जमीन पर चलता है, वहीं हॉपर छलांग लगाकर ऊबड़-खाबड़ इलाके को पार कर सकता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि वह ऐसे गहरे क्रेटरों में उतर सकेगा, जहां पहियों वाला रोवर पहुंचना मुश्किल समझेगा। स्थायी रूप से छाया में रहने वाले इन इलाकों में क्रेटरों की खड़ी दीवारें और बेहद असमान जमीन है। इसके अलावा वहां लगातार अंधेरा रहता है। हॉपर को ऐसे माहौल में खुद अपनी दिशा तय करनी होगी और पृथ्वी के साथ संचार बनाए रखना होगा। यही तकनीक चंद्रमा के उन हिस्सों तक पहुंचने में मदद कर सकती है, जिन्हें अब तक सीधे देखना और वहां जाकर जांच करना बेहद मुश्किल रहा है।
सिर्फ पानी की मौजूदगी नहीं, उसकी असली कहानी खोजेगा मिशन
चंद्रमा के ध्रुवीय इलाकों में पानी मौजूद होने के मजबूत सबूत पहले से मिल चुके हैं। इसलिए चांग’ई-7 का मकसद सिर्फ यह साबित करना नहीं है कि वहां पानी है। वैज्ञानिक अब इससे ज्यादा जानना चाहते हैं। पानी वास्तव में कहां मौजूद है? वह सतह पर है या मिट्टी के अंदर? उसकी मात्रा कितनी है? किस रूप में मौजूद है? और सबसे अहम—क्या उसे वहां से निकालना व्यावहारिक होगा?

इन सवालों के जवाब भविष्य के चंद्र अभियानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। अगर पर्याप्त मात्रा में बर्फ उपलब्ध हुई और उसे निकालना संभव हुआ, तो चंद्रमा पर पानी को पृथ्वी से ले जाने की जरूरत कम हो सकती है। यानी चांग’ई-7 का काम सिर्फ चंद्रमा की खोज तक सीमित नहीं रहेगा। यह यह समझने की दिशा में भी एक कदम होगा कि चंद्रमा के प्राकृतिक संसाधनों का भविष्य में वास्तव में इस्तेमाल किया जा सकता है या नहीं।
क्या चंद्रमा के पानी पर किसी का ‘स्वामित्व’ हो सकता है?
यह सवाल अब सिर्फ विज्ञान का नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियमों का भी है। 1967 की संयुक्त राष्ट्र बाह्य अंतरिक्ष संधि किसी देश को चंद्रमा पर संप्रभुता का दावा करने या उसे अपने क्षेत्र के रूप में कब्जे में लेने की अनुमति नहीं देती। हालांकि, यह संधि अंतरिक्ष में वाणिज्यिक गतिविधियों पर सीधे रोक नहीं लगाती। लेकिन निजी कंपनियों की अंतरिक्ष गतिविधियों को संबंधित देशों द्वारा अधिकृत और निगरानी में रखा जाना जरूरी है। समस्या यह है कि संधि अंतरिक्ष में मिले प्राकृतिक संसाधनों के स्वामित्व के सवाल का कोई सीधा जवाब नहीं देती। इसलिए चंद्रमा पर पानी की खोज जितना वैज्ञानिक सवाल है, उतना ही भविष्य में कानूनी और अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय भी बन सकता है।
चंद्रमा पर पानी खोजना इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
चंद्रमा के ध्रुवीय इलाकों में जमा प्राचीन बर्फ सिर्फ भविष्य के लिए पानी का स्रोत नहीं हो सकती। वह चंद्रमा और पृथ्वी के पुराने इतिहास का रिकॉर्ड भी अपने अंदर छिपाए हो सकती है। इस बर्फ में चंद्रमा की पुरानी ज्वालामुखीय गतिविधियों और धूमकेतुओं व क्षुद्रग्रहों के जरिए पृथ्वी-चंद्रमा प्रणाली में पहुंचे पानी के बारे में सुराग मिल सकते हैं। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि पृथ्वी के महासागरों के लिए पानी आखिर कहां से आया।
अगर चंद्रमा पर पर्याप्त पानी मिला, तो भविष्य के मानव अभियानों में इसका इस्तेमाल पीने के पानी के लिए किया जा सकता है। इससे उपकरणों को ठंडा रखने में भी मदद मिल सकती है। पानी से हाइड्रोजन निकाला जा सकता है, जिसका इस्तेमाल ईंधन के रूप में किया जा सकता है। वहीं ऑक्सीजन को अलग करके सांस लेने और दूसरे कामों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तरह चंद्रमा की बर्फ भविष्य में सिर्फ एक वैज्ञानिक खोज नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में लंबे अभियानों के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन बन सकती है।
नासा अपना रहा है अलग रास्ता
चीन अकेला देश नहीं है जो चंद्रमा के इन संसाधनों को समझने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका भी लंबे समय में चंद्रमा पर लगातार और स्थायी गतिविधियां स्थापित करने की दिशा में काम कर रहा है। नासा के सामने भी वही भौतिक चुनौतियां हैं, लेकिन उन्हें हल करने का उसका तरीका चीन से अलग है। चांग’ई-7 एक समन्वित सरकारी मिशन है, जिसमें ऑर्बिटर, लैंडर, रोवर और हॉपर को एक ही बड़े वैज्ञानिक लक्ष्य के लिए तैयार किया गया है। यह पहले से मौजूद च्वेछियाओ-2 रिले उपग्रह की मदद भी ले सकता है। नासा दूसरी तरफ अपने Commercial Lunar Payload Services (CLPS) कार्यक्रम के जरिए चंद्रमा तक पहुंचने के लिए एक व्यावसायिक मॉडल विकसित कर रहा है। इस कार्यक्रम के तहत नासा निजी कंपनियों से चंद्रमा तक वैज्ञानिक उपकरण पहुंचाने और वहां जरूरी तकनीकी सेवाएं देने की व्यवस्था करता है। इन कंपनियों के पास अपने अंतरिक्ष यान होते हैं और वे उनका संचालन भी खुद करती हैं। अब तक नासा ने 17 मिशनों के लिए अनुबंध किए हैं, जिनके तहत 60 से ज्यादा वैज्ञानिक उपकरण चंद्रमा तक पहुंचाए जाने हैं।चीन और अमेरिका का तरीका अलग जरूर है, लेकिन दोनों की नजर एक ही बड़ी समस्या पर है—क्या चंद्रमा सिर्फ पृथ्वी के पास मौजूद एक खगोलीय पिंड है, या भविष्य में इंसानों के लिए एक ऐसा पड़ाव भी बन सकता है जहां से आगे अंतरिक्ष की यात्रा शुरू की जा सके? चंद्रमा के स्थायी रूप से अंधेरे क्रेटरों में जमी बर्फ इस सवाल का जवाब देने में अहम भूमिका निभा सकती है।






