मछलियां क्लीनिंग स्टेशन को लेकर आपस में झगड़ती हैं। झींगे अपने शिकार को एक तरह के “सोनिक वेपन” से बेहोश कर देते हैं। और एक छोटा-सा कीड़ा पानी के अंदर इतना शोर मचा सकता है, जितना किसी ऑर्केस्ट्रा में सुनाई देता है। फिर भी, जमीन पर रहने वाले हम लोगों के लिए समुद्र के अंदर चल रहा यह पूरा साउंडट्रैक लगभग अनसुना ही रहता है। भौतिक विज्ञानी हेलेन ज़र्स्की के मुताबिक, इसकी एक बड़ी वजह समुद्र की सतह का व्यवहार है। हेलेन ज़र्स्की बीबीसी रेडियो के कार्यक्रम ‘रेयर अर्थ’ की प्रेज़ेंटर हैं और ‘ब्लू मशीन’ किताब की लेखिका भी हैं। उनकी किताब बताती है कि समुद्र किस तरह हमारी दुनिया को आकार देता है।
वह समुद्र की सतह की तुलना एक टू-वे मिरर से करती हैं। “समुद्र की सतह एक टू-वे मिरर की तरह काम करती है। हवा से आने वाली आवाज़ पानी में नीचे जा सकती है, लेकिन सतह से टकराकर वह वापस ऊपर चली जाती है। पानी के अंदर पैदा होने वाली आवाज़ें सतह तक तो पहुंच सकती हैं, लेकिन वहां से टकराकर वापस नीचे चली जाती हैं। इसलिए वे हम तक नहीं पहुंच पातीं।”
देखने से ज़्यादा ज़रूरी है आवाज़
इंसानों के लिए दुनिया को समझने का सबसे अहम तरीका आंखें हैं। लेकिन पानी के अंदर कहानी बिल्कुल अलग है। समुद्र में करीब 200 मीटर से ज्यादा गहराई तक सूरज की रोशनी बहुत कम पहुंचती है। उसके बाद अंधेरा लगातार बढ़ता जाता है। ऐसे में समुद्री जानवरों के लिए सिर्फ देखकर अपने आसपास की दुनिया को समझना आसान नहीं होता। यहीं आवाज़ की अहमियत सामने आती है। पानी के अंदर आवाज़ बहुत दूर तक यात्रा कर सकती है। इसलिए समुद्री जानवर इसका इस्तेमाल एक-दूसरे को संकेत देने, अपने आसपास का पता लगाने और लंबी दूरी तक संपर्क बनाए रखने के लिए करते हैं।
यानी जिस समुद्र को ऊपर से देखने पर हमें अक्सर शांत दिखाई देता है, उसके अंदर लगातार आवाज़ों की एक पूरी दुनिया चल रही होती है। मछलियों से लेकर झींगों और छोटे-छोटे जीवों तक, हर कोई इस पानी के भीतर चलने वाले साउंडट्रैक का हिस्सा है।





