15 मार्च की शाम सिक्किम, दार्जिलिंग और आसपास के इलाकों में लोगों ने आसमान में एक बड़ी, चमकदार और जेलीफिश जैसी आकृति देखी। नीचे जमीन पर अंधेरा हो चुका था, लेकिन आसमान में वह नीली-सफेद रोशनी कुछ देर तक साफ दिखाई देती रही।
असामान्य आकार और चमक को देखकर कई लोगों ने इसे UFO यानी दूसरे ग्रह का यान समझ लिया। लेकिन वैज्ञानिक नजर से देखें तो यह घटना पूरी तरह प्राकृतिक भौतिकी और आधुनिक रॉकेट तकनीक से जुड़ी थी।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह Space Jellyfish जैसा दृश्य SpaceX के Falcon 9 रॉकेट के लॉन्च के बाद बना। रॉकेट फ्लोरिडा से लॉन्च हुआ था और अपने साथ Starlink उपग्रहों को अंतरिक्ष की ओर ले जा रहा था।
जेलीफिश जैसा आकार कैसे बना?
इस घटना को समझने के लिए हमें रॉकेट के पीछे निकलने वाली गैसों को देखना होगा।
जब Falcon 9 ऊंचाई पर पहुंचता है, तो उसके इंजन से निकलने वाला एग्जॉस्ट प्लूम आसपास के बहुत कम दबाव वाले वातावरण में तेजी से फैलता है। नीचे जमीन पर तब तक शाम हो चुकी होती है, लेकिन रॉकेट की ऊंचाई पर सूर्य की रोशनी अभी भी मौजूद हो सकती है।
यही इस पूरे दृश्य की सबसे दिलचस्प बात है।
सूर्य की रोशनी जब ऊंचाई पर फैले एग्जॉस्ट प्लूम और उसके छोटे-छोटे कणों पर पड़ती है, तो वे रोशनी को हमारी तरफ बिखेरने लगते हैं। नीचे से देखने पर फैलती हुई गैसों का आकार कभी बड़े चमकदार गोले, कभी छाते और कभी जेलीफिश जैसा दिखाई दे सकता है।
असल में हमें रॉकेट खुद जेलीफिश की तरह उड़ता हुआ नहीं दिख रहा था। हम उसकी ऊंचाई पर फैले एग्जॉस्ट प्लूम को सूर्य की रोशनी में चमकते हुए देख रहे थे।
यह नजारा कितनी देर दिखाई दिया?
सिक्किम और आसपास के इलाकों में यह असामान्य रोशनी करीब 5 से 7 मिनट तक दिखाई देने की रिपोर्ट सामने आई।
इतनी देर तक एक ही जगह के आसपास चमकता हुआ बड़ा आकार दिखाई देना इसे सामान्य विमान या किसी छोटे उल्कापिंड से अलग बनाता है।
रॉकेट की ऊंचाई, उसके एग्जॉस्ट का फैलाव और उस समय सूर्य की स्थिति—इन तीनों ने मिलकर ऐसा दृश्य बनाया, जो जमीन से देखने पर काफी रहस्यमय लग रहा था।
Space Jellyfish और UFO में क्या फर्क है?
आसमान में दिखाई देने वाली हर असामान्य रोशनी किसी अज्ञात वस्तु का संकेत नहीं होती।
Space Jellyfish इसका अच्छा उदाहरण है। इसमें कोई अज्ञात उड़ने वाली वस्तु नहीं थी। यह एक ज्ञात रॉकेट लॉन्च के बाद ऊंचाई पर बने गैसों के फैलाव और उन पर पड़ रही सूर्य की रोशनी का परिणाम था।
ऐसे दृश्यों को समझने में एक और बात मदद करती है—आसमान और जमीन पर रोशनी की स्थिति एक जैसी नहीं होती।
जमीन पर सूर्य डूबने के बाद हमें अंधेरा दिखाई दे सकता है, जबकि कई सौ किलोमीटर ऊपर किसी वस्तु पर सूर्य की सीधी रोशनी अभी भी पड़ रही होती है। इसलिए रॉकेट का एग्जॉस्ट नीचे से चमकता हुआ दिखाई दे सकता है।
यही वजह है कि रॉकेट लॉन्च कभी-कभी ऐसे दृश्य पैदा करते हैं, जिन्हें पहली नजर में समझना मुश्किल होता है।
सिक्किम में हाल में और कौन से आसमानी नजारे दिखे?
सिक्किम और पूर्वोत्तर भारत में हाल के महीनों में लोगों को कई अलग-अलग प्राकृतिक और खगोलीय घटनाएं देखने को मिली हैं।
जनवरी 2026 की भारी बर्फबारी
जनवरी 2026 में उत्तरी और पूर्वी सिक्किम के कई इलाकों में भारी बर्फबारी हुई थी। इससे पहाड़ी इलाके सफेद बर्फ की चादर से ढक गए थे।
यह खगोलीय घटना नहीं थी, लेकिन इसने सिक्किम के पहाड़ी इलाकों को एक अलग ही रूप दे दिया था।
3 मार्च 2026 का ब्लड मून
3 मार्च 2026 को सिक्किम समेत पूर्वोत्तर भारत के कई हिस्सों में पूर्ण चंद्र ग्रहण दिखाई दिया।
पूर्ण चंद्र ग्रहण के दौरान पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है। पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है, लेकिन सूर्य की कुछ लाल रोशनी पृथ्वी के वायुमंडल से होकर चंद्रमा तक पहुंचती रहती है।
इसी वजह से ग्रहण के दौरान चंद्रमा गहरे लाल या नारंगी रंग का दिखाई दे सकता है। इसे आम तौर पर ब्लड मून कहा जाता है।
ब्रिटेन और जर्मनी में दिखी आग जैसी रोशनी क्या थी?
मार्च 2026 के मध्य में यूरोप और उत्तरी अमेरिका के कुछ हिस्सों से आसमान में चमकीली आग जैसी रोशनी दिखाई देने की रिपोर्टें भी सामने आईं।
ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के आसमान में दिखाई दिए एक चमकीले आग के गोले के कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए।
ऐसे दृश्य आम तौर पर fireball meteor यानी बेहद चमकीले उल्का से जुड़े होते हैं।
जब कोई छोटा अंतरिक्षीय पिंड बहुत तेज गति से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है, तो उसके सामने मौजूद हवा तेजी से संपीड़ित और गर्म होती है। पिंड से पदार्थ भी निकलता है और वह टूटकर या जलकर चमक पैदा कर सकता है। अगर यह चमक सामान्य उल्का की तुलना में बहुत ज्यादा तेज हो, तो उसे fireball कहा जाता है।
इसलिए आसमान में कुछ सेकंड के लिए दिखाई देने वाला चमकीला आग का गोला और कई मिनट तक फैलती हुई जेलीफिश जैसी आकृति—दोनों को एक ही घटना मानना सही नहीं होगा।
भारत में दिखा नजारा उल्का नहीं, रॉकेट का था
सिक्किम और पूर्वोत्तर भारत के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि वहां दिखाई देने वाली जेलीफिश जैसी आकृति को रॉकेट लॉन्च से जोड़कर देखा गया।
यह कोई उल्का नहीं था जो कुछ सेकंड में वायुमंडल को चीरकर गायब हो गया हो। रॉकेट के ऊंचाई तक पहुंचने के बाद उसके एग्जॉस्ट प्लूम का फैलना और सूर्य की रोशनी का उस पर पड़ना इस लंबे और असामान्य दृश्य की वजह बना।
यानी जमीन से देखने पर जो चीज किसी रहस्यमय UFO जैसी लग रही थी, वह वास्तव में इंसानों की बनाई हुई एक मशीन और सूर्य की रोशनी से पैदा हुआ बेहद खूबसूरत दृश्य था।
आसमान में ऐसी घटनाएं हमें एक दिलचस्प बात याद दिलाती हैं—कई बार कोई नजारा जितना रहस्यमय दिखाई देता है, उसके पीछे की भौतिकी उतनी ही शानदार होती है।





