वॉशिंगटन: प्रशांत महासागर में स्थित बिकिनी एटोल कभी अमेरिका का प्रमुख न्यूक्लियर टेस्ट साइट था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने 1946 से 1958 के बीच यहां कुल 23 परमाणु परीक्षण किए। इन परीक्षणों ने इस छोटे से द्वीप समूह और उसके आसपास के समुद्री इलाके को बुरी तरह प्रभावित किया। सबसे बड़ा धमाका ‘कैसल ब्रावो’ था। यह एक हाइड्रोजन बम था, जिसकी क्षमता करीब 15 मेगाटन थी। यह हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम से करीब 1000 गुना ज्यादा शक्तिशाली था। धमाके के दौरान बेहद ज्यादा तापमान पैदा हुआ और समुद्री इलाके में भारी तबाही हुई। विस्फोट ने समुद्र के बीच करीब 2 किलोमीटर चौड़ा और 73 मीटर गहरा गड्ढा बना दिया। आसपास के तीन द्वीप भी पूरी तरह नष्ट हो गए।
उस समय ऐसा लग सकता था कि इस इलाके में समुद्री जीवन के लिए भविष्य नहीं बचा है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। करीब सात दशक बाद वैज्ञानिकों ने उसी इलाके में समुद्री जीवन की वापसी के ऐसे संकेत देखे, जो इस बात को समझने का मौका देते हैं कि प्रकृति बड़े पैमाने पर हुए नुकसान के बाद किस तरह वापस उभर सकती है।
Bikini Atoll: महाविनाश के बाद कितनी जिंदगी लौटी?
वैज्ञानिकों ने 2008 में अनुमान लगाया था कि इस इलाके की करीब 65 प्रतिशत जैव विविधता वापस आ चुकी थी।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि यहां का पुराना पूरा इकोसिस्टम लौट आया है।
परमाणु रेडिएशन का असर लंबे समय तक बना रहा और सभी प्रजातियां वापस नहीं आ सकीं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, कोरल की 28 प्रजातियां अभी भी इस इलाके से गायब हैं और माना जाता है कि वे स्थानीय स्तर पर विलुप्त हो चुकी हैं।
यह नुकसान खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि हार्ड कोरल सिर्फ समुद्र की खूबसूरती का हिस्सा नहीं होते। वे पूरे रीफ के ढांचे को बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
उनकी जटिल संरचनाएं मछलियों और दूसरे बिना रीढ़ वाले समुद्री जीवों को रहने और छिपने की जगह देती हैं। फिर यही छोटे जीव बड़ी मछलियों और शार्क जैसे शिकारियों के लिए भोजन का आधार बनते हैं।
इसलिए किसी इलाके से कोरल की कई प्रजातियों का गायब होना सिर्फ एक प्रजाति का नुकसान नहीं है। इसका असर पूरे समुद्री खाद्य जाल पर पड़ सकता है।
समुद्री जीवन का ‘चमत्कारी’ पुनर्जीवन
परमाणु परीक्षणों के करीब 70 साल बाद वैज्ञानिकों, जिनमें स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता भी शामिल थे, ने इस प्रतिबंधित इलाके का दौरा किया। जो उन्होंने देखा, वह बेहद दिलचस्प था। परमाणु विस्फोट से बने विशाल गड्ढे के अंदर बड़े-बड़े कोरल रीफ दोबारा विकसित हो चुके थे। कई जगहों पर ये कोरल स्वस्थ और जीवंत दिखाई दिए। वैज्ञानिकों ने आसपास के समुद्री इलाके में शार्क, टूना और स्नैपर जैसी कई मछली प्रजातियों को भी देखा। तटों पर विशाल कोकोनट क्रैब्स की मौजूदगी भी दर्ज की गई। यह पूरी तरह पहले जैसा इकोसिस्टम नहीं है। कई प्रजातियां अभी भी गायब हैं और रेडिएशन का इतिहास इस जगह को बाकी सामान्य समुद्री इलाकों से अलग बनाता है। फिर भी, इतनी बड़ी तबाही के बाद समुद्री जीवन का इस स्तर तक लौटना वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण है।
इस वापसी की सबसे बड़ी वजहों में से एक शायद वही चीज है जो कभी इस जगह की तबाही का कारण बनी थी—इंसानों की गैरमौजूदगी।परमाणु परीक्षणों और रेडिएशन के कारण यहां इंसानों का रहना, आना-जाना और मछली पकड़ना लंबे समय से प्रतिबंधित रहा है। इसका मतलब था कि समुद्री जीवों को लगातार मछली पकड़ने, पर्यटन, निर्माण और दूसरे मानवीय दबावों का सामना नहीं करना पड़ा।प्रकृति को खुद को संभालने के लिए दशकों का समय मिला। बिकिनी एटोल इसलिए वैज्ञानिकों के लिए एक असामान्य प्राकृतिक प्रयोग जैसा बन गया है। यह दिखाता है कि किसी बड़े विनाश के बाद भी समुद्री इकोसिस्टम में वापसी की क्षमता हो सकती है—लेकिन साथ ही यह भी कि वापसी का मतलब हमेशा पहले जैसी जैव विविधता का पूरी तरह लौट आना नहीं होता। यानी समुद्र ने यहां खुद को काफी हद तक फिर से खड़ा किया है, लेकिन परमाणु परीक्षणों के निशान अब भी इसकी जैविक कहानी का हिस्सा हैं।



